हजारों करोड़ रूपये और न जाने कितने करोड़ डॉलर खर्च करके कृत्रिम महामानव की छवि गढ़कर जो 56 इंची गुब्बारा फुलाया गया था उसे महज 5 दिन में युवतर भारत ने जंतर मंतर पर छूमन्तर कर दिया। हाल के इतिहास में यह ऐसी नैतिक पराजय है जिसके सदमे से आंय-बांय-सांय रील बनाने के बाद भी प्रधानमंत्री उबर नहीं पा रहे हैं। उनका संघी कुनबा देशद्रोही, विदेशी फंडिंग, पाकिस्तान प्रायोजित बताने और हिन्दू-मुस्लिम एंगल घुसाने जैसे अपने सारे अस्त्र-शस्त्र आजमाने के बाद भी जिससे सुलझ नहीं पा रहा है।
स्वयं को सकल ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली भाजपा, पृथ्वी का सबसे विशाल स्वयंसेवी संगठन का दावा करने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और अखिल विश्व के मसले उनसे पूछकर हल किये जाते हैं का दंभ भरने वाले नरेंद्र मोदी सिड़बिड़ाये हुए हैं। लोकतंत्र में विश्वास करने वाले होते तो इससे सबक लेते, चूकों, गलतियों और कमजोरियों को चीन्हते और सर झुकाकर वादा करते कि अब भविष्य में उन्हें नहीं दोहराया जाएगा।
मगर जिनके गुणसूत्रों में ही तानाशाही और फासिज्म हो, उनसे इसकी उम्मीद करना भेड़ियों के शाकाहारी हो जाने का भरम पालना है।युवाओं के तूफानी गुस्से के दबाव में, मजबूरी में, ‘भ्रष्ट और नाकारा’ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद से ही युवतर व्हार्ट –जेन-जी– को आतंकित करने के लिए युद्ध सा छेड़ दिया गया है। शुरुआत ठीक इसी काम के लिए रखे गए फुट सोल्जर्स से ‘गटर छाप’ गालीगलौज की झड़ी लगाकर की गयी।
जेन-जी ने जब उसके धुर्रे उड़ा दिए तो अब सारी दिखावटी मानमर्यादा को ताक पर रखकर पार्टी के आलाकमान प्रधानमंत्री और उनके आलाकमान मोहन भगवत सहित पूरे का पूरा संघ मैदान में कूद पड़ा है।
शुरुआत खुद मोदी ने एकदम खांटी मोदी स्टाइल में की : बजाय इसके कि वे अपनी पुलिस और सुरक्षा बलों की उन ज्यादतियों और निर्ममताओं, जिनकी जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट तक को जांच के आदेश देने पड़े, के लिए देश और युवाओं से माफ़ी मांगते, सादी वर्दी में लाये गए शाखा के लोगों और असामाजिक तत्वों द्वारा पुलिस बल के साथ मिलकर की गयी गुंडई और लड़कियों के साथ अश्लील बर्ताब के लिए खेद जताते और उनको दण्डित करने का वादा करते…
बजाय इसके कि वे अपने मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, नेताओं और संघी दुष्प्रचार ब्रिगेड की अशिष्ट और अपमानजनक टिप्पणियों के लिए उनकी तरफ से जेन-जी से माफ़ी मांगते, उन्होंने युवाओं को माफ़ करने की अपनी इच्छा जताई! यह ढीठता की पराकाष्ठा से भी आगे की बात है। यह ठीक ऐसी बात है जैसे दुशासन और युधिष्ठिर दोनों द्रौपदी को, राम सीता को, याज्ञवल्क्य गार्गी को, कंस देवकी को माफ करने की बात कहें।
जैसे पूरा रघुकुल अपनी उदारता दिखाते हुए शम्बूक को माफ़ कर दे। द्रोणाचार्य एकलव्य को, पुष्यमित्र शुंग अपने हाथों मारे सारे बौद्ध भिक्खुओ को क्षमा कर दे। मनु कबीर और रैदास, जोतिबा और पेरियार, अम्बेडकर और मार्क्स को माफ़ कर दे। गोडसे गांधी को माफ़ कर दे। हालांकि ऐसा कभी होगा नहीं तब भी कल्पना के लिए मान लें तो यह वैसी ही माफ़ी है जैसे मोदी के गुजरात में 2002 के नरसंहार में नाम जहान खो देने वालों को मोदी माफ कर दें।
पीड़ितों को उत्पीड़क द्वारा माफ़ करने का यह कारनामा असल में देश के भविष्य के लिए तमान यातनाएं सहने वालों के खिलाफ उत्पीड़न की पैलेट गन से गोलियों की नयी बौछार शुरू करने का एलान था। यह जेन-जी और उसके बहाने उन सबके खिलाफ युद्ध घोष था जिन्होंने इस युवा पीढ़ी की अनोखी लड़ाई में उसके प्रति एकजुटता दिखाई थी।
यही हुआ भी। भाजपा और संघ परिवार से जुड़े सोशल मीडिया एकाउंट्स ने आन्दोलन में आये युवाओं के, उनके माता पिताओं के पते और फोन नम्बर्स सार्वजनिक करके उनके पीछे अपनी ट्रोल सेना को छू बोल दिया। भाजपा के पदाधिकारियों ने निर्देश जारी किये कि जंतर मंतर पहुँची या उसके समर्थन में बात रखने वाली लड़कियों को खासतौर से पहचाना जाना चाहिए और उनके फोन नम्बर, पते वगैरा सबको बताकर उन्हें “मशहूर” किया जाना चाहिए।
साफ़ एलान किया गया कि किसी को भी माफ़ नहीं किया जाएगा। इन युवाओं के घरों पर सिर्फ फोन ही नहीं किये गए, अम्बानी के चैनल के ‘संवाददाता’ उनके पतों के आधार पर उनके यहाँ तक पहुँच गए और उन्हें परेशान करने का सिलसिला शुरू कर दिया गया। इधर ‘माफ़ करना चाहता हूँ’ के मगरमच्छ के आंसू थे उधर घेराबंदी की जा रही थी।
आन्दोलन के समर्थन में रील बनाने वाली एक 15 साल की बच्ची का रोते बिलखते हुए माफी मांगने का वीडियो वायरल करके एक उदाहरण पेश करने की कोशिश की गयी। डरी वह बच्ची नहीं थी, डरे उसके माता-पिता थे, जिन्हें उनके शहर के संघी गिरोह ने इतना धमकाया और भयभीत किया था कि उन्हें अपनी अवयस्क बेटी से वह कातर वीडियो बनवाने के लिए मजबूर होना पड़ा। खुद संघी आई टी सेल ने इस वीडियो को वायरल करवाया – मगर इसके बाद भी इस नन्हीं-सी-बच्ची को बख्शा नहीं गया।
उसने बताया है कि अभी भी उसे रेप करने और मार डालने की धमकियां मिल रही हैं।
जिस अंदाज में माफ़ किये जाने का यह स्वांग रचा गया है, उसके तरीके ही नहीं, इरादे भी फासीवादी हैं। जंतर मंतर पर लाखों की तादाद में लड़के लड़कियां यूं ही नहीं आ गए थे। वे क्यों आये थे, इसके बारे में मोदी की माफ़ी देने वाली रील पूरी तरह चुप्प है। न नीट के पर्चों के बार-बार लीक होने का अफ़सोस है, ना धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे का जिक्र है। सिर्फ उन कथित गालियों पर विलाप है, जिन्हें आन्दोलन के दौरान कथित रूप से युवाओं ने अपनी मीम्स और रील्स में दिया बताया जाता है।
मजेदार विडम्बना यह है कि इन गालियों से आहत, दुखी यहाँ तक कि सांस्कृतिक सदमे में पहुँच जाने की बात वह प्रधानमंत्री कर रहा है, जिसने खुद सार्वजनिक भाषा के पतन में अहम योगादान दिया। उस पार्टी का नेता कर रहा है जिसने अपनी गंदी और अश्लील गालियों के रिकॉर्ड कायम किये हैं। मोदी जिस बड़प्पन का दिखावा कर रहे हैं वह असल में उत्पीड़न की नयी बाढ़ लाने का इशारा है।
असहमति को नादानी बताकर लोकतान्त्रिक प्रतिरोध को ही आपराधिक करार देने की कोशिश तानाशाही मनोवृत्ति का इजहार है और जबरिया पूरे देश का पितृपुरुष और अभिभावक बन जाने की अनाधिकार चेष्टा है। मोदी भूल रहे हैं कि जंतर मंतर पर आये हुए युवा उनके बच्चे और बच्चियां नहीं है : एक संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य के नागरिक हैं – और गलत को गलत कहकर वे अपने नागरिक होने के अधिकार और कर्तव्य का पालन कर रहे हैं।
मोदी जिसे सांस्कृतिक सदमा – कल्चरल शॉक – बताते हैं वह इन युवाओं का आन्दोलन नहीं है। असल कल्चरल शॉक तो 2014 में लगा था जब भारत की विरासत, परम्परा, सद्भाव और समावेशी संस्कृति की विलोम धारा के प्रतिनिधि के रूप में भाजपा सत्ता में पहुंची थी और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे। असल सांस्कृतिक सदमा उसके बाद के 12 बरस में हुए कुकर्म हैं जिन्होंने भारत की अवधारणा को ही चुनौती पेश की है।
भारत को एक ख़ास तरह के जड़ और कूपमंडूक, समाज के विराट बहुमत विशेषकर स्त्रियों को जकड़न में जकड़ने की मुहिम छेड़ रखी है। जिसे यह हिन्दू राष्ट्र बताते हैं उस मनु आधारित सामजिक ढाँचे को बहाल करने की साजिशें रची जा रही हैं।
मोदी इसी बात को आगे बढ़ाते हैं। वे प्रतिरोध का भी जेन्डर देखते हैं। उन्हें लड़कों से शिकायत नहीं हैं, लड़कियों द्वारा कही गयी बातें उन्हें सांस्कृतिक सदमा देने वाली हैं। यहाँ भी उन्हें स्त्री का बोलना अखरता है। गाली गलौज करने और अश्लीलता करने वाले पुरुषों से उन्हें कोई शिकायत नहीं है : ऐसे अनेक सर्टिफाइड गालीबाज दुष्टों को तो वे अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर फॉलो भी करते हैं। उन्हें बलात्कार की धमकियां देने वाले, नग्न और अश्लील फर्जी वीडियो बनाने वाले अपने कुटुम्बियों के आचरण से सदमा नहीं लगता।
मगर सड़कों पर आकर प्रतिरोध में हिस्सा लेते, बिना डरे अपनी बात बेबाक तरीके से रखती युवतियों को देख उन्हें धक्का लगता है। प्रधानमंत्री अपने वीडियो में उन्हें अलग से चिन्हांकित करते हैं और उनका पूरा कुनबा छांट छांटकर महिला आन्दोलनकारियों के पीछे पड़ जाता है। यह अनायास नहीं है, यह उनकी उस कल्चर का आख्यान है जिसे वे पांच हजार वर्षों के सामाजिक सांस्कृतिक विकास का निषेध करके भारत पर थोपना चाहते हैं।
इस मामले में उनका विचार कुटुम्ब उनके साथ है। सबसे पहले उनके संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत बोले। थोड़ा दबे छुपे इशारों में कहा कि, ‘जेन ज़ी …. स्वभाव से भावुक है। वे बहुत शांत दिमाग से नहीं सोचते।“ उन्हें बेदिमाग और भावुक बताने के बाद तुरंत ही सीधे ठीये पर आ गये और कहा कि “भारत में महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन, जिसे युवाओं के बीच व्यापक समर्थन मिला, वह भी अंततः नुकसानदेह साबित हुआ।“
आरएसएस के सह सरकार्यवाह – संयुक्त महासचिव – अतुल लिमये ने बिल्ली को थैले से बाहर लाकर सीधे दूध के बर्तन के पास बिठा दिया। जंतर मंतर आन्दोलन को देश विरोधी – एंटी नेशनल – और संविधान विरोधी बताते हुए उन्होंने कहा कि “इस आंदोलन को केवल एक घटना मानकर नहीं देखना चाहिए। यह कई वर्षों से चल रही एक प्रक्रिया का परिणाम है। इसलिए इसकी केस स्टडी करना जरूरी है।
इसके लिए हमें इसकी क्रोनोलॉजी – घटनाक्रम -, मेथोडोलोजी – कार्यपद्धति -, सपोर्ट सिस्टम – समर्थन तंत्र -, नेटवर्क इन्नोवेशन -नए प्रयोग – और इसके पीछे की आइडियोलॉजी – विचारधारा – को समझना होगा।”
इस केस स्टडी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने उसके बिंदु भी रखे और आंदोलन की रणनीति का अध्ययन करने और उसके सामाजिक प्रभाव आंकने पर भी उन्होंने जोर दिया। उन्हें इस आन्दोलन की समीक्षा में आई एक टिप्पणी “भविष्य का लोकतंत्र केवल संसद नहीं, बल्कि सड़कें तय करेंगी। केवल चुनाव नहीं, बल्कि प्रतिरोध तय करेगा।” का भी कुछ इस तरह उल्लेख किया जैसे ऐसा कहना कोई अपराध हो।
इसी के साथ इस बात का अध्ययन भी करने को कहा कि वामपंथी विचारधारा का प्रभाव कैसे बढ़ा? विभिन्न राजनीतिक दल इसमें कैसे जुड़े? एक छात्र आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक आंदोलन में कैसे बदल गया? पूरे देश में एक जैसी गतिविधियों का समन्वय किस प्रकार हुआ?
लिमये इसका जवाब भी देते हैं और युवाओं और विद्यार्थियों का आंदोलन था, इसलिए एस एफ आई और आइसा की भूमिका को रेखांकित करते हैं। इसके अलावा मानवाधिकार, आदिवासी, महिला, मुस्लिम, ईसाई, किसान, मजदूर, पर्यावरण, पत्रकारिता और विधिक सहायता से जुड़े अनेक संगठनों के इसमें भाग लेने या समर्थन करने का उल्लेख करते हुए इन सबके एक मंच पर आने के पीछे कौन था समझने की हिदायत देते हैं।
ऐसा करते करते वे वामपंथी सोच को इसके पीछे बताते हैं कि वामपंथी विचारधारा ऐसे आंदोलनों को वैकल्पिक राजनीति का सफल मॉडल मानती है। इस कड़ी में वे अंटोनियो ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्व – कल्चरल हेजेमोनी – के विश्लेषण तक पहुँच गए और कहा कि ऐसी विचारधाराओं – आन्दोलनों – का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार पर भी पड़ता है।
अंततः वे लौट फिरकर स्त्री के आखेट पर आ गए और बोले कि “भारतीय संस्कृति स्त्री को मातृभाव से देखने की शिक्षा देती है, जबकि कुछ आंदोलनों में इसके विपरीत भाषा और व्यवहार देखने को मिला।“
जाहिर है कि सिर्फ सरकार ही नहीं उसका रिमोटधारी संघ भी युवाओं –जेन जी – के आक्रोश के इस अनुशासित, शांतिपूर्ण और रचनात्मक स्फोट से स्तब्ध और हतप्रभ है। मगर अपने फासिस्टी स्वभाव के चलते उससे कोई लोकतांत्रिक सबक लेने की बजाय उसका इरादा प्रतिशोध और दमन के रास्ते पर आगे बढ़ने का है। आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने ‘विवादित हस्तियां’ नाम से सूची जारी की, जिन्होंने सीजेपी के आह्वान पर शुरू हुए जंतर-मंतर आंदोलन का समर्थन किया था।
11 लोगों की इस सूची में सूची में दूसरे स्थान पर संयुक्त किसान मोर्चा है। तीसरे स्थान पर सीपीएम के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास हैं । संघ मुखपत्र ने इन पर राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने का आरोप लगाया है।
कुल जमा यह कि मोदी के माफ़ी देने के साथ जो प्रहसन शुरू हुआ है उसे त्रासदी में बदलने की तैयारी की जा रही है। यह पूरे विधि- विधान के साथ हुए हिंदू राष्ट्र की ओर प्रस्थान का अनुष्ठान है। अगर इस तरह की माफ़ी देने की प्रथा चली तो जब थोड़ा कच्चा सा, अधपका हिंदू राष्ट्र बन जायेगा तो जनरल डायर जलियांवाला बाग को माफ करने आयेगा। उसके बाद बनेंगे नये विधि विधान : पसलियां मोहताज होंगी चाकुओं की माफी की।
मनुष्यता इंतजार करेगी बर्बरताओं द्वारा क्षमा किए जाने का। जो अभी भी तटस्थ हैं वे सबसे अगली कतार में हैं। उनकी बेटियों और बेटों को माफ किए जाने के बाद उनको भी किया जाना है माफ। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा इसका एलान करने के लिए 10 अगस्त को देश भर में 1000 से ज्यादा जगहों पर ‘अडानी अम्बानी के चाकरो भारत छोड़ो’, ‘ट्रम्प से डरने वालो भारत छोड़ो’ का नारा गुंजाते हुए सत्याग्रह करेंगे लाखों भारतीय : रास्ता यही है।
(कार्टून साभार : राजेंद्र धोड़पकर)
(लेखक लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)